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International Journal of
Sociology and Political Science
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VOL. 8, ISSUE 3 (2026)
स्वामी विवेकानन्द के चिंतन में भविष्य के भारत की परिकल्पना
Authors
डॉ वंदना शर्मा, अशोक यादव
Abstract
स्वामी विवेकानन्द ने भारत के भविष्य की परिकल्पना केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रखी, बल्कि ऐसे राष्ट्र की कल्पना की जो आध्यात्मिक रूप से जागृत, सामाजिक रूप से समतामूलक, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर तथा नैतिक रूप से सुदृढ़ हो। उनके अनुसार भविष्य का राष्ट्र ऐसा होना चाहिए जहाँ सभी नागरिकों को समान अवसर और सम्मान मिले। विश्व धर्म संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण में विवेकानंद ने विश्वबंधुत्व, धार्मिक सहिष्णुता और मानव एकता का संदेश दिया। उनके अनुसार भविष्य का आदर्श राष्ट्र वह है जो अपनी संस्कृति को बनाए रखते हुए पूरी मानवता के कल्याण के लिए कार्य करे। भविष्य की भारतीय शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो आत्मविश्वास, आत्मबल, विवेक, नैतिकता और कर्मशीलता का विकास करे। इस प्रकार की शिक्षा व्यक्ति को केवल विद्वान नहीं, बल्कि आदर्श नागरिक और सशक्त राष्ट्रनिर्माता बनाती है। विवेकानंद के अनुसार भविष्य की शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण होना चाहिए। उनका स्पष्ट कथन है कि यदि शिक्षा मनुष्य में सत्यनिष्ठा, साहस, आत्मसंयम, अनुशासन और सेवा-भाव उत्पन्न नहीं करती, तो वह अधूरी है। भविष्य चिंतन के संदर्भ में उनके विचार यह स्पष्ट करते हैं कि यदि व्यक्ति का चरित्र सुदृढ़ होगा तो उसका भविष्य सुरक्षित, समाज संगठित और राष्ट्र शक्तिशाली बनेगा। इस प्रकार स्वामी विवेकानंद के अनुसार चरित्र निर्माण केवल व्यक्तिगत विकास का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और मानवता के कल्याण का मूल आधार है। स्वामी विवेकानंद के भविष्य चिंतन में महिला सशक्तिकरण राष्ट्र निर्माण और सामाजिक प्रगति का अनिवार्य आधार है। उनका स्पष्ट मत था कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति तब तक संभव नहीं है जब तक उसकी महिलाएँ शिक्षित, आत्मनिर्भर, सम्मानित और सशक्त न हों। भविष्य चिंतन के संदर्भ में विवेकानंद का लोकतांत्रिक दृष्टिकोण नैतिक नेतृत्व, जनकल्याण और लोकभागीदारी पर आधारित है। वे मानते थे कि राष्ट्र की उन्नति तभी संभव है जब शासन और समाज दोनों का उद्देश्य जनसेवा, न्याय, समान अवसर और नैतिक उत्तरदायित्व हो। उन्होंने युवाओं से चरित्रवान, निर्भीक और राष्ट्रनिष्ठ बनने का आह्वान किया, क्योंकि उनके अनुसार ऐसे नागरिक ही लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ बना सकते हैं। स्वामी विवेकानंद के भविष्य चिंतन में विश्वगुरु भारत की अवधारणा भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, नैतिक और मानवीय नेतृत्व क्षमता पर आधारित है। उनके अनुसार भारत का भविष्य केवल आर्थिक समृद्धि, राजनीतिक शक्ति या सैन्य सामर्थ्य से नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा, सार्वभौमिक मानव मूल्यों और ज्ञान-विज्ञान के समन्वय के माध्यम से निर्मित होगा।

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Pages:159-165
How to cite this article:
डॉ वंदना शर्मा, अशोक यादव "स्वामी विवेकानन्द के चिंतन में भविष्य के भारत की परिकल्पना". International Journal of Sociology and Political Science, Vol 8, Issue 3, 2026, Pages 159-165

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