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VOL. 8, ISSUE 3 (2026)
बिहार में आरक्षण की राजनीति और सामाजिक न्याय: मंडल आयोग से जातीय सर्वेक्षण तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व एवं सामाजिक परिवर्तन का ऐतिहासिक अध्ययन
Authors
राजू कुमार
Abstract
भारतीय राजनीति के इतिहास में बिहार हमेशा से सामाजिक-राजनीतिक चेतना, आंदोलनों और नीतिगत बदलावों की प्रयोगशाला रहा है। भारत में सामाजिक न्याय की अवधारणा केवल आर्थिक विकास तक सीमित न होकर, ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को सामाजिक सम्मान, राजकीय संस्थाओं में अवसर तथा सत्ता में भागीदारी दिलाने से जुड़ी रही है। इस प्रक्रिया में 'आरक्षण' केवल एक कल्याणकारी नीति नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना के पुनर्गठन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को विस्तार देने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। स्वतंत्रता के पूर्व से शुरू हुआ यह संघर्ष 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने के बाद अपने चरम पर पहुँचा और हालिया 'जातीय आधारित सर्वेक्षण (2022-23)' के साथ एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है।
बिहार की सामाजिक संरचना पारंपरिक रूप से जटिल जातिगत पदानुक्रम, जमींदारी व्यवस्था और उच्च जातियों के सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व से संचालित होती रही है। 20वीं सदी के पूर्वार्ध में 'त्रिवेणी संघ' के गठन ने पिछड़ी जातियों के भीतर चेतना का बीजारोपण किया, जिसे स्वतंत्रता के बाद जननायक कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी नेताओं ने संस्थागत आकार दिया। 1978 में लागू 'कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला' (मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों के आधार पर) ने अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) और अत्यंत पिछड़े वर्गों (EBC) के बीच अंतर स्पष्ट कर सामाजिक न्याय की राजनीति को अधिक समावेशी बनाया। यह व्यवस्था बाद में राष्ट्रीय स्तर पर नीति-निर्माण का आधार बनी।1990 के दशक में मंडल आयोग की रिपोर्ट का क्रियान्वयन और बिहार में उभरता नया राजनीतिक नेतृत्व राज्य की राजनीति में युगांतरकारी मोड़ साबित हुआ। इस दौर ने कांग्रेस के पारंपरिक वर्चस्व को समाप्त कर बहुजन राजनीति की नींव रखी। राजनीति का केंद्र केवल आर्थिक मुद्दों से हटकर "स्वर", "सम्मान" और "भागीदारी" पर केंद्रित हो गया। इसके परिणामस्वरूप, राज्य विधायिका और कार्यपालिका में पिछड़े, अति-पिछड़े और दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ा, जिससे पारंपरिक सत्ता संतुलन में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला।
21वीं सदी के उत्तरार्ध में बिहार की सामाजिक न्याय की राजनीति ने एक नया क्षितिज छुआ। नीतीश कुमार के नेतृत्व में अत्यंत पिछड़े वर्गों, महादलितों और महिलाओं के लिए पंचायती राज संस्थाओं एवं सरकारी नौकरियों में आरक्षण (जैसे स्थानीय निकायों में EBC को 20% और महिलाओं को 50% आरक्षण) का प्रावधान किया गया। इसने शक्ति के विकेंद्रीकरण को निचले स्तर तक पहुँचाया। वहीं, हालिया 'जातीय आधारित सर्वेक्षण (2022-23)' ने सामाजिक न्याय की राजनीति को अनुभवजन्य और वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित कर दिया है। 63% से अधिक आबादी वाले OBC और EBC समूहों के आधिकारिक आंकड़ों ने आरक्षण की 50% की पारंपरिक सीमा को चुनौती दी और "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" के विचार को एक नया संवैधानिक और सामाजिक आधार प्रदान किया। प्रस्तुत अध्ययन का मुख्य उद्देश्य मंडल आयोग के दौर से लेकर जातीय सर्वेक्षण तक के बिहार के राजनीतिक-सामाजिक सफर का आलोचनात्मक एवं ऐतिहासिक विश्लेषण करना है। यह शोध इस बात की जांच करता है कि कैसे आरक्षण की नीतियों ने पारंपरिक सामाजिक पदानुक्रम को तोड़कर वंचित समूहों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया। साथ ही, यह अध्ययन इस बात का भी मूल्यांकन करता है कि क्या यह राजनीतिक सशक्तिकरण वास्तविक सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण में बदल पाया है या केवल जातीय लामबंदी और चुनावी गोलबंदी का साधन बनकर रह गया है।
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Pages:166-171
How to cite this article:
राजू कुमार "बिहार में आरक्षण की राजनीति और सामाजिक न्याय: मंडल आयोग से जातीय सर्वेक्षण तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व एवं सामाजिक परिवर्तन का ऐतिहासिक अध्ययन". International Journal of Sociology and Political Science, Vol 8, Issue 3, 2026, Pages 166-171
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