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VOL. 7, ISSUE 4 (2025)
कार्यशील महिलाऐं एवं सामाजिक यथार्थ
Authors
नागेश्वरी कुमारी, डॉ. रश्मि
Abstract
भारतीय समाज धर्म प्रधान समाज रहा है, जहां कि जीवन का हर पक्ष किसी न किसी रुप में धर्म द्वारा परिभाषित एवं नियंत्रित रहा है। अतः भारतीय संदर्भ में नारी भी अपने विभिन्न रुपों में (पुत्री, पत्नी, मां, बहन आदि में) धर्म से परिबद्ध रही है। नारी की पूर्णतया का प्रमुख आधार विवाह माना गया, जिसे की भारतीय संस्कृति में जन्म-जन्मांतर का रिश्ता, धार्मिक संस्कार एवं अटूट बंधन माना गया। इन्हीं धारणाओं एवं विश्वासों के फलस्वरुप वैवाहिक संबंधों में किसी भी असामंजस्य परिस्थितियों को भी बिना किसी शिकायत की सहन किया गया। चूकी परंपरागत रूप में पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था थी। किंतु समकालीन भारतीय समाज में परिवर्तन की आधुनिक प्रक्रियाओं, औद्योगिकरण, पश्चिमीकरण, नगरीकरण, आधुनिकीकरण, लौकिकीकरण व भौतिकवादी विचारधारा ने महिलाओं को कार्य- क्षेत्र में तो ला दिया।
लेकिन नैतिक सामाजिक, सांस्कृतिक आदर्शों तथा मूल्यों में उतनी तीव्रता से बदलाव न होने के फलस्वरुप पारिवारिक असंगतियां और तनाव तथा भूमिका संघर्ष उत्पन्न हो गए, जिसका गलत प्रभाव न केवल पारिवारिक सामंजस्य पर पड़ा बल्कि उनके कार्यकारी संबंध भी इससे प्रभावित हुए। अतः शोधकर्ता ने कार्यशील महिलाओं के कार्यकारी संबंधों और पारिवारिक असंगतियों के प्रभाव को समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया है।
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Pages:72-73
How to cite this article:
नागेश्वरी कुमारी, डॉ. रश्मि "कार्यशील महिलाऐं एवं सामाजिक यथार्थ". International Journal of Sociology and Political Science, Vol 7, Issue 4, 2025, Pages 72-73
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