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VOL. 7, ISSUE 2 (2025)
स्वतंत्रता में स्वदेशी की भूमिका: गांधीवादी दृष्टिकोण
Authors
राजदीप चतुर्वेदी
Abstract
गाँधी दर्शन का मूल आधार अहिंसा पर आधारित सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करना, जिसमें नागरिकों व राज्य के मध्य उत्तरदायित्वपूर्ण संबंध हो, यही उत्तरदायी संबंध ही स्वराज का मार्ग प्रशस्त करेंगे, गाँधी दर्शन में स्वराज केवल राजनीतिक एवं प्रशासनिक अवधारणा नहीं है, अपितु सामाजिक कुरुतियों का उन्मूलन कर शोषणविहीन आत्मनिर्भर सामाजिक-आर्थिक संस्चना का निर्माण करना ही स्वराज है। गाँधीजी का स्वराज आत्मनिर्भर व्यक्तियों का समुच्चय है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति श्रम करके अपनी आजीविका प्राप्त करता है, इसके लिए गाँधीजी कुटीर उद्योगों की स्थापना पर बल देते हैं और स्वदेशी को स्थापित करते हैं।1 स्वराज की भावना उत्पन्न करने में स्वदेशी राज्यवस्था अर्थात स्वदेषी ग्रामीण अर्थव्यवस्था यथा खादी उद्योग, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प, समतामूलक समाज की स्थापना, स्त्रियों के कल्याण, पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक एवं स्वेदशी नैतिक मूल्यों की भूमिका अहम है। अर्थात स्वदेशी का तात्पर्य सिर्फ देश की सीमाओं में बनी सामाग्रियोें के प्रयोग से ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक परंपराओं व मूल्यों का अनुसरण करते हुए नवीन जीवन मूल्यों को विकसित करते हुए आत्मनियंत्रित समाज का निर्माण करें, जिस्से स्वराज के वास्तविक मर्म को आत्मसात कर सकें ।
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Pages:88-92
How to cite this article:
राजदीप चतुर्वेदी "स्वतंत्रता में स्वदेशी की भूमिका: गांधीवादी दृष्टिकोण". International Journal of Sociology and Political Science, Vol 7, Issue 2, 2025, Pages 88-92
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