समकालीन भारत में तीव्र आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय संरक्षण
के मध्य संतुलन स्थापित करना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया है। नीति आयोग के अनुसार वर्ष
2030 तक देश को पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में परिवर्तित किया जाए, जिसके लिए औद्योगीकरण, आधारभूत ढांचे
का विस्तार और ऊर्जा संसाधनों का अधिकतम उपयोग अपरिहार्य माना जा रहा है। दूसरी ओर,
पर्यावरणीय रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि इस विकास प्रक्रिया के कारण पारिस्थितिकी
तंत्र पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
2022 के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग 1.5 मिलियन हेक्टेयर वन भूमि विकास परियोजनाओं के लिए
अधिग्रहित की जा रही है।
यह शोध पत्र नीति-निर्माण के द्वंद्वात्मक स्वरूप का गहन विश्लेषण
करता है। यह शोध सतत विकास के लक्ष्यों (SDGs), विशेषतः SDG-13 (Climate Action) और SDG-15 (Life on Land) के संदर्भ में भारत की नीतिगत प्रतिबद्धताओं
की आलोचनात्मक और वस्तुनिष्ठ समीक्षा करता है । इस लेख का उद्देश्य यह है कि विकास
और संरक्षण के मध्य सामंजस्य स्थापित करने हेतु नीतिगत सुधारों की संभावनाओं को राजनीतिक
दृष्टिकोण को उजागर किया जा सके।
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