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International Journal of
Sociology and Political Science
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VOL. 7, ISSUE 1 (2025)
नगरीय स्थानीय संस्थाओं की स्वायत्तता: वर्तमान परिदृश्य
Authors
डॉ. सपना
Abstract
हमारा स्वभाव कुछ ऐसा पड़ गया है कि शासन के विषय में हम सर्वथा उच्च स्तर पर ही लोकतन्त्र की बात सोचते हैं स्थानीय स्तर पर नहीं। यदि लोकतन्त्र के नींव का निर्माण नीचे से न किया गया तो सम्भव है कि लोकतन्त्र पूर्णतः सफल न हो सके। ‘स्थानीय स्वशासन’, लोकतन्त्र के हर स्वरूप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और होना भी चाहिए। भारतीय राजनीतिक इतिहास में स्थानीय स्वशासन से नगरीय स्थानीय संस्थाओं व पंचायती राज संस्थान तक का सफर वैदिक-उत्तर वैदिक युग, मौर्य काल, मुगल एवं ब्रिटिश काल से स्वतन्त्र भारत में संवैधानिक मान्यता प्राप्त होने तक सुनहरे दौर से गुजरते हुये इन्हीं भावनाओं से ओत-प्रोत रहा। नगरीय स्थानीय संस्थाओं व पंचायती राज संस्थाओं की अतीत से वर्तमान तक की विकास यात्रा यह स्पष्ट करती है कि मुनष्य की मनोवैज्ञानिक एवं व्यावहारिक अनिवार्यताओं हेतु स्थानीय स्वशासन अपरिहार्य रहीं हैं।
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Pages:1-4
How to cite this article:
डॉ. सपना "नगरीय स्थानीय संस्थाओं की स्वायत्तता: वर्तमान परिदृश्य". International Journal of Sociology and Political Science, Vol 7, Issue 1, 2025, Pages 1-4
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