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VOL. 6, ISSUE 2 (2024)
दीनदयाल उपाध्याय के दृष्टिकोण से वितरणात्मक न्याय का पुनरावलोकन: एकात्म मानववाद और इसकी समकालीन प्रासंगिकता
Authors
डॉ. गजेन्द्र
Abstract
एक आदर्श राज्य की कल्पना को साकार करने की पहल राजनीतिक दर्शन में वर्षाे से होती चली आ रही है। यूनानी दर्शन में प्लेटो, अरस्तू जैसे दार्शनिको ने अपनी कृतियों जैसे रिपब्लिक तथा पॉलिटिक्स में एक आदर्श राज्य कैसे स्थापित हो, इस पर अपने अपने विचार प्रस्तुत किये है। भारतीय दर्शन में रामराज्य, महाभारत के शांति पर्व में सामाजिक समझौते के आधार पर राज्य का निर्माण , बौद्ध साम्राज्य के प्रजातंत्र आदि के वर्णन देखने को मिलते है। इन तमाम दर्शनों के बावजूद पश्चिम को लोकतंत्र के आधार के रूप में देखा जाता है। दीनदयाल उपाध्याय इन विक्रतियो को दूर करना चाहते थे जिसके लिए उन्होंने भारतीय दर्शन से ही एकात्म मानववाद नामक सिद्धन्त का प्रतिपादन किया। (1) यह लेख दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के सिद्धांत को वितरणात्मक न्याय के एक संभावित ढांचे के रूप में जांचता है। जिस प्रकार वितरणात्मक न्याय का उद्देश्य आदर्श राज्य का निर्माण करना है ठीक उसी प्रकार एकात्म मानववाद का उद्देश्य भी एक आदर्श राज्य का निर्माण है। वितरणात्मक न्याय के तहत निष्पक्षता, संसाधनों व जिम्मेदारियों का उचित वितरण आदि पर ध्यान दिया जाता है। दीनदयाल उपाध्याय का एकात्ममानव सिद्धांत भी इन सद्धांतो के पालन पर विचार करता है। तत्कालीन समय में प्रचलित पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों को खारिज करते हुए दीनदयाल उपाध्याय ने आध्यात्मिक और भौतिक संतुलन की भारतीय परंपरा में निहित एक दर्शन विकसित किया। (2)यह लेख तर्क देता है कि उनके विचार जो विकेंद्रीकरण, स्वदेशी और समुदाय कल्याण पर केंद्रित हैं, आधुनिक वितरणात्मक न्याय की बहस के लिए एक प्रासंगिक विकल्प प्रस्तुत करते हैं। (3) यह अध्ययन दीनदयाल उपाध्याय के दृष्टिकोण और पश्चिमी न्याय सिद्धांतों, विशेष रूप से जॉन रॉल्स के श्न्याय के निष्पक्षता सिद्धांत और मार्क्सवादी पुनर्वितरण के बीच तुलना करते हुए यह बताने का प्रयास करता है कि किस प्रकार दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद का सिद्धांत, जॉन रोल्स के न्याय के सिद्धांत और कार्ल मार्क्स के आर्थिक वर्ग-संघर्ष से बेहतर विकल्प प्रस्तुत करता है।
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Pages:59-64
How to cite this article:
डॉ. गजेन्द्र "दीनदयाल उपाध्याय के दृष्टिकोण से वितरणात्मक न्याय का पुनरावलोकन: एकात्म मानववाद और इसकी समकालीन प्रासंगिकता". International Journal of Sociology and Political Science, Vol 6, Issue 2, 2024, Pages 59-64
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