ARCHIVES
VOL. 5, ISSUE 2 (2023)
हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सामरिक स्थिति और भारतीय हितों के समक्ष उत्पन्न चुनौतियाँ व संभावनाएं
Authors
डॉ. विवेक कुमार राय, वीरेंद्र बहादुर पाण्डेय
Abstract
प्रस्तुत शोध पत्र कोविड के दौरान हिंददृप्रशांत क्षेत्र के एक नए राजनीतिक रंगमंच के रूप में उभरने के कारणों और परिणामों के आकलन के साथ शुरू होता है। जहां प्रमुख शक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका और उभरती हुई महाशक्ति चीन के बीच पुनः ध्रुवीयता का ग्रेटदृगेम शुरू हो गया है। इसलिए इस क्षेत्र का प्रमुख हित धारक होने के नाते भारत के लिए हिंददृप्रशांत केंद्रित विष्व में अपनी रणनीतिक स्थिति को बेहतर करना निश्चित रूप से एक बड़ी व गंभीर चुनौती है। इसी संबंध में भारत की रणनीतिक स्थिति और संभावनाओं पर विमर्श प्रस्तुत किया गया है।
दुनिया की 10 बड़ी स्थाई सेनाओं में से सात दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे परिष्कृत नौसेना और दुनिया के घोषित परमाणु राष्ट्रों में से पांच के साथ हिंददृप्रशांत क्षेत्र दुनिया का सबसे सैन्यकृत क्षेत्र भी है। इसके अलावा यहां वैष्विक वाणिज्य के 5 समुद्री चेकप्वाइंट है, जिसमें स्ट्रेटदृऑफदृमलक्का भी शामिल है। जिसके माध्यम से विष्व का एक चौथाई व्यापार होता है। इसके साथ ही यह क्षेत्र दुनिया के लगभग 70ः प्राकृतिक संसाधनों का स्रोत भी है। इससे स्पष्ट होता है कि हिंददृप्रशांत क्षेत्र विष्व की गुरुत्व शक्ति का नया आर्थिक केंद्र है और यह वैष्विक भूदृराजनीति का आधार बन गया है।
शोध पत्र का मुख्य भाग कोविड पश्चात भारत की हिंददृप्रशांत रणनीति पर केंद्रित है। जिसके तहत भारत की मुक्त, खुली और समावेशी हिंददृप्रशांत नीति के साथ-साथ क्षेत्र में ‘एक्टदृईस्टदृनीति’ को मजबूत करने का परीक्षण किया गया है। इसलिए यह शोध पत्र हिंददृप्रशांत रिम एसोसिएशन, आसियान क्षेत्रीय मंच, पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन आदि जैसे क्षेत्रीय संस्थानों के साथ भारत का समावेश और इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव और आक्रामक रवैया को संतुलित करने के लिए क्वाड और क्वाडदृप्लस जैसे बहुपक्षीय संरचनाओं में भारत के रणनीतिक सहयोग का विश्लेषण करता है। साथ ही भारत के सुरक्षित समावेशी और नियम आधारित विष्वदृव्यवस्था की खोज का अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह लेख इस संदर्भ में भारत की हिंददृप्रशांत नीति और उभरती हुई नई विष्व व्यवस्था में एक ‘अग्रणी शक्ति’ के रूप में भारत के उदय को गति देने में इसके महत्व का भी विश्लेषण करने का प्रयास करता है। वस्तुतः 2014 से ‘एक्टदृईस्टदृपॉलिसी’ ने पूर्व के देशों के साथ भारत के संबंधों को एक नई दिशा, गति और ऊर्जा प्रदान की है और तेजी से यह हिंददृप्रशांत में भारत की भागीदारी के लिए एक सेतु बनता जा रहा है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि ‘एक्टदृईस्ट अब एक्ट हिंददृप्रशांत’ में तब्दील हो रहा है। भारत की रणनीतिक स्थिति और रुख से संबंधित एक और महत्वपूर्ण मुद्दा भारत के इरादों और उनकी क्षमताओं के बीच अंतर को पहचानना है। निश्चित रूप से भारतीय नौसेना के पास हिंददृप्रशांत क्षेत्र में अपने वाणिज्यिक और रणनीतिक हितों की रक्षा करने की क्षमता है और अब भारत के पास एक विकासशील ‘ब्लूदृवाटर नेवी’ भी है लेकिन दक्षिणी चीन सागर या प्रशांत क्षेत्र में संलग्न होने की इसकी क्षमता वर्तमान में सीमित ही है।
वस्तुतः भारत को चीन का सीधा विरोध करने के किसी भी कार्य से बचना चाहिए। भारत को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह वैष्विक शक्तियों के समक्ष ‘गलवान को ना रखें और ताइवान को ही फोकस में रखे’ अर्थात भारत को चीन के साथ अपने विवादों को द्विपक्षीय स्तर पर ही रखना चाहिए।
Download
Pages:25-29
How to cite this article:
डॉ. विवेक कुमार राय, वीरेंद्र बहादुर पाण्डेय "हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सामरिक स्थिति और भारतीय हितों के समक्ष उत्पन्न चुनौतियाँ व संभावनाएं". International Journal of Sociology and Political Science, Vol 5, Issue 2, 2023, Pages 25-29
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

