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VOL. 3, ISSUE 2 (2021)
गाँधी दर्शन और वैश्विक परिदृश्य
Authors
पवन कुमार तिवारी
Abstract
आज विश्व उथल-पुथल के महासागर में गोते खा रहा है जहाँ एक तरफ हम 21वीं शताब्दी की विकसित तकनीक की तरफ बढ़ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हम अपनी मूल संस्कृति को खोते जा रहे हैं जो कि सृष्टि में जन्म लेते ही एक मनुष्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और मनुष्य को इस बात को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि वह इस सृष्टि का सबसे ज्यादा समझदार एवं सूझबूझ वाला प्राणी है और उसके कन्धों पर समाज को आगे ले जाने की जिम्मेदारी है। इसके विपरीत आज जनमानस का अधिकांश भाग व्यभिचार, हिंसा, चोरी, छल आदि में लिप्त होता जा रहा है जो कि आने वाले समय में पूरे भूमण्डल के लिए बहुत बड़े खतरे की तरफ ले जाने का संकेत है और आज व्यक्ति इन्हीं कुरीतियों को अपनी सफलता की सीढ़ी बना रहा है। गाँधीजी ने 20वीं शताबदी में ही इन विषयों पर गहन प्रकाश डालते हुए कहा था कि अगर मनुष्य को अपने आप को, समाज को, राष्ट्र को समृद्ध बनाना है तो उसे हिंसा, असपृश्यता, व्यभिचार, नारी विभेद, छुआछूत आदि को त्यागना पड़ेगा तभी जाकर हम एक समृद्ध समाज और मजबूत राष्ट्र की कल्पना कर सकते हैं।
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Pages:61-63
How to cite this article:
पवन कुमार तिवारी "गाँधी दर्शन और वैश्विक परिदृश्य ". International Journal of Sociology and Political Science, Vol 3, Issue 2, 2021, Pages 61-63
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